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चीनी खाकर मुंह मीठा किया… डिलीवरी बॉय बना डिप्टी कलेक्टर…

तीन जज़्बे, एक प्रेरणा: बबीता, विष्णु और सूरज की कहानी।

ये कहानी है उन चेहरों की, जिन्हें दुनिया ने मामूली समझा – लेकिन इन्होंने साबित कर दिया कि हालात चाहे जैसे हों, इरादे बुलंद हों तो नामुमकिन कुछ भी नहीं।

बबीता पहाड़िया -झारखंड की विलुप्तप्राय पहाड़िया जनजाति से आने वाली बबीता ने अफसरी का सपना देखा, तो उसे पूरा करके ही दम लिया। समाज के ताने, आर्थिक तंगी और शादी का दबाव – सब कुछ झेला, लेकिन रुकी नहीं। जब घर में मिठाई खरीदने के पैसे नहीं थे, तब मां ने चीनी खिलाकर बेटी की कामयाबी मनाई। बबीता अब अफसर बन चुकी हैं – अपने समुदाय की पहली उम्मीद की किरण।

विष्णु मुंडा -जन्म से दिव्यांग विष्णु ने 9 साल तक लगातार संघर्ष किया। दिन में ट्यूशन पढ़ाई, रात को आदिवासी हॉस्टल में किताबों से जंग – और अंत में सफलता ने दरवाज़ा खटखटाया। विष्णु की कहानी हमें बताती है कि कमी शरीर में नहीं, सोच में होती है। आज वे जेपीएससी पास कर समाज के लिए एक नई मिसाल बन चुके हैं।

सूरज यादव डिप्टी कलेक्टर बनने का सपना लेकर गिरिडीह से रांची पहुंचे। सूरज ने कभी डिलीवरी बॉय बनकर पढ़ाई का खर्चा उठाया। बाइक नहीं थी, तो दोस्तों ने अपनी स्कॉलरशिप के पैसे दिए। सूरज ने पांच घंटे डिलीवरी की, फिर घंटों पढ़ाई की। इंटरव्यू में जब उन्होंने बोर्ड को अपनी सच्चाई बताई, तो सवालों की बौछार हुई – लेकिन जवाब भी उतने ही सटीक । आज वे अफसर हैं, लेकिन संघर्ष की पहचान नहीं भूले।

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