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जस्टिस यशवंत वर्मा को उनके पद से हटाने का प्रस्ताव संसद में पेश किया गया

जस्टिस यशवंत वर्मा पर महाभियोग का खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की हैं। यह तरीका पहले जस्टिस वी रामास्वामी ने अपनाया था। वह सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज थे। उन्होंने महाभियोग की कार्यवाही को 3 साल से ज्यादा समय तक खींचा। इसमें उनके ससुर, पत्नी और तमिलनाडु के एक सांसद ने उनकी मदद की। अब जस्टिस यशवंत वर्मा भी ऐसा ही कर रहे हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनके इस विकल्प को जल्दी से बंद कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने एक हफ्ते से भी कम समय में फैसला सुनाया है। इसमें कहा गया है कि तीन जजों की कमेटी की इन हाउस प्रक्रिया संवैधानिक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कानून के हिसाब से सही है, लेकिन इसे समस्या और बढ गई है। जस्टिस वर्मा के लिए दरवाजा बंद करके, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसी प्रक्रिया का समर्थन किया है जो गलत है। यह प्रक्रिया डिजाइन और काम करने के तरीके दोनों में गलत है। महाभियोग की प्रक्रिया बहुत लंबी और बेकार है। इससे न्याय मिलना मुश्किल है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज देश के सबसे बडे प न्यायिक अधिकारी होते हैं। इसलिए, उन्हें हटान े की प्रक्रिया सही होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक चेतावनी है। संसद को जस्टिस वर्मा पर महाभियोग चलाते समय न्यायिक ईमानदारी को गंभीरता से लेना चाहिए।

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